शेयर बाज़ार प्रश्न - उत्तर|

प्रश्न - सिक्योरिटीज़ मार्केट से आप क्या समझते हैं?

सिक्योरिटीज़ मार्केट में वो सभी चीज़ें शामिल हैं जिनके दायरे में फ़ाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स या वित्तीय साधनों की ट्रेडिंग यानी की खरीद फरोख्त की जाती है। सिक्योरिटी का मतलब है निवेश का वो ज़रिया जो मालिकाना हक या अधिकार के बारे में बताता हो। सिक्योरिटी का सबसे आसान उदाहरण है स्टॉक्स या शेयर्स (मालिकाना) और बॉण्ड्स और डिबेंचर्स (क्रेडिटशिप)। सिक्योरिटी का सबसे ज़रूरी गुण ये है कि इसे खुले बाज़ार में खरीदा जा सकता है, मिसाल के तौर पर शेयर्स, बॉण्ड्स और डिबेंचर्स। जबकि बैंक लोन और गाड़ियों के इंश्योरेंस डीम्ड सिक्योरिटीज़ के दायरे में नहीं आते।

आम बोलचाल में सिक्योरिटी मार्केट को ही शेयर मार्केट कहा जाता है।

प्रश्न स्टॉक का क्या मतलब है?

स्टॉक किसी कंपनी में हिस्सेदारी को तय करता है। जब भी आप किसी कंपनी के शेयर्स खरीदते हैं तो आप उनके जरिए उस कंपनी में कुछ हिस्सा खरीदते हैं। इसका मतलब ये है कि शेयर्स किसी कंपनी में आपकी हिस्सेदारी का सबूत हैं और कंपनी में होने वाले नफ़ा नुकसान का असर आप पर यानी आपके निवेश पर पड़ता है। ये याद रखिए कि स्टॉक्स को ही इक्विटी के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न बॉण्डस और डिबेंचर का मतलब क्या है?

भारत में बॉण्डस और डिबेंचर्स में ज़्यादा फ़र्क नहीं है। यही वजह है कि दोनों टर्म्स या शब्द का इस्तेमाल एक-दूसरे के लिए किया जाता है। एक डिबेंचर किसी कंपनी के लिए बॉरोइंग यूनिट्स यानी उधार ली गई यूनिट्स के बारे में बताता है। बॉण्ड्स या डिबेंचर्स की ट्रेडिंग किसी आम शेयर की तरह की जा सकती है। डिबेंचर जारी करने वाली कंपनी निवेशक को मैच्योरिटी के वक्त फेस वैल्यू के अलावा नियमित ब्याज देने का भरोसा दिलाती है। शेयरधारकों के उलट डिबेंचर धारक को तयशुदा रिटर्न की गारंटी मिलती है। इससे उसके निवेश पर जोखिम कम हो जाता है। साथ ही उसे कंपनी की तरक्की में भी हिस्सा नहीं मिलता है, जो कि किसी शेयरधारक को मिलता है।

प्रश्न प्राइमरी और सेकेंडरी मार्केट में क्या फ़र्क है?

कैपिटल मार्केट मुख्य तौर पर दो हिस्सों में बंटा हुआ है, हालांकि दोनों एक ही संस्थान और एक ही फ्रेमवर्क के भीतर काम करते है। प्राइमरी मार्केट या इनीशियल पब्लिक ऑफ़र (आईपीओ) मार्केट में कंपनी फंड की उगाही के लिए पहली बार और सीधे तौर पर निवेशक के पास जाती हैं और इसके लिए शेयर्स या डिबेंचर्स जारी करती हैं। यानी जब आप अपना पैसा किसी आईपीओ में लगाते हैं तो आप प्राइमरी मार्केट में प्रवेश करते हैं। सेकेंडरी मार्केट वो जगह है जहां खरीदार और बेचनेवाले इनीशियल ऑफर में मिले शेयर्स की खरीद-बिक्री करते हैं। मिसाल के तौर पर अगर आप आज की तारीख में इंफोसिस या रिलायंस पावर के शेयरों की खरीद-फरोख्त करते हैं, तो ये सब सेकेंडरी मार्केट में होता है।

प्रश्न शेयर कितने तरह के होते हैं?

आमतौर पर शेयर्स निम्नलिखित तरह के होते हैं:

ऑर्डिनरी या साधारण शेयर्स ये किसी भी औद्योगिक उपक्रम में निवेशक की आंशिक हिस्सेदारी का प्रतिनिधित्व करते हैं। आम शेयरधारक ने जिस कंपनी में निवेश किया है उसके मुनाफ़े से डिविडेंड पाता है। अगर वो कंपनी किसी वजह से बंद हो रही है तो पहले सारे हिस्सेदार जैसे कि सरकार, कर्मचारी, कर्जदाता, प्रिफरेंशियल शेयरधारक को भुगतान किया जाता है। इसके बाद अगर रकम बचती है तो आम शेयरधारक को भुगतान किया जाता है।

प्रिफरेंस या वरीय शेयर्स जैसा कि नाम से ही जाहिर होता है प्रिफरेंश शेयरधारक कंपनी की प्राथमिकता लिस्ट में आम शेयरधारकों से ऊपर होता है। यानी जब भी डिविडेंड या कंपनी बंद होने की दशा में भुगतान की बात आती है तो प्रिफरेंस शेयरधारकों को प्राथमिकता दी जाती है।

प्रश्न शेयर्स इश्यूड एट पार और शेयर्ड इश्यूड एट प्रीमियम में क्या अंतर है?

पार वैल्यू किसी शेयर की अनुमानित या नोशनल वैल्यू होती है, यानी कि वो कीमत जो उसे जारी करने वाली कंपनी की बैलेंस शीट में दर्ज होती है। आमतौर पर कंपनियां 10 या 100 रुपये की पार वैल्यू रखती है। लेकिन कंपनियां कोई भी पार वैल्यू तय कर सकती हैं लेकिन वह 10 के गुणक या फ्रैक्शन में होनी चाहिए जैसे कि 15.5। कंपनी इनीशियल इश्यू के बाद पार वैल्यू में बदलाव कर सकती है।

कोई कंपनी पार वैल्यू से ज्यादा कीमत के शेयर जारी कर सकती है, जिसे प्रीमियम कहा जाता है, अगर वह सेबी के प्रॉफिटेबिलिटी क्राइटेरिया या लाभ देन सकने के पैमाने पर खरी उतरती है। इसका मतलब ये हुआ कि कोई कंपनी जरूरी रकम उगाहने के लिए कम शेयर जारी कर पाएगी और साथ ही उसकी डिविडेंड लाएबिलिटी या लाभांश की देनदारी भी उसी के हिसाब से कम हो जाएगी।

उदाहरण के तौर पर ऐसापैसा लिमिटेड के शेयर्स की पार वैल्यू 10 रुपये है लेकिन कंपनी सेबी के प्रॉफिटैबिलिटी क्राइटेरिया पर खरी उतरती है इसलिए वो अपने शेयरों को 25 रुपये की कीमत पर जारी कर सकती है। यानी 15 रुपये के प्रीमियम पर

यहां ये बात ध्यान रखने वाली है कि कंपनी अपना लाभांश या डिविडेंड शेयर के पार या फेस वैल्यू पर घोषित करती है, चाहे वो शेयर कितने भी प्रीमियम पर जारी क्यों ना हुआ हो।

प्रश्न नए शेयर यानी आईपीओ की कीमत कैसे तय की जाती है?

इनीशियल पब्लिक ऑफर के मामले में कंपनियां निम्न में से किसी एक तरीके का इस्तेमाल करते हुए शेयर की कीमत तय करती हैं-

फिक्स्ड प्राइस मेथड या तय कीमत विधि इसके मुताबिक जिस कीमत शेयर ऑफर किए जाते हैं उसे कंपनी फिक्स कर देती है। ये काम इश्यू खुलने से पहले ही कर लिया जाता है। शेयरों की डिमांड कितनी है इसका पता कंपनी को तभी हो पाता है जब इश्यू बंद हो जाता है। आपको बता दें कि इस विधि से शेयर्स प्रीमियम पर भी लिस्ट किए जा सकते हैं।

बुक बिल्डिंग विधि इस विधि में निवेशक को ये नहीं पता होता है कि ऑफर किए शेयर की असल कीमत क्या होगी? इसकी बजाय कंपनी शेयर के लिए सांकेतिक प्राइस रेंज तय करती है। निवेशक अपनी क्षमता के मुताबिक अलग अलग शेयरों के लिए बोली लगाते हैं। ये बोली तय प्राइस रेंज के भीतर कुछ भी हो सकती है। सब्सक्रिप्शन या शेयरों के लिए आई बोली की तादाद को देखते हुए शेयर की कीमत तय की जाती है। और जितने भी निवेशकों ने इसके लिए आवेदन किया होता है उन्हें इसी कीमत पर शेयर दिए जाते हैं, चाहे उन्होंने बोली में कोई और रकम तय की हो। आर्थिक जगत में कहा जाता है कि बुक बिल्डिंग विधि के जरिए शेयर की बेहतर कीमत मिलती है। ओवरसब्सक्रिप्शन होने पर कंपनी ग्रीनहाउस ऑप्शन का भी इस्तेमाल कर सकती है।

ग्रीनहाउस ऑप्शन या विकल्प - अक्सर ऐसा देखा जाता है कि ज़्यादातर अच्छी कंपनियों के आईपीओ तय सीमा से कई गुना ज्यादा बिकते हैं यानी ओवरसब्सक्राइब हो जाते हैं। ऐसे में कंपनी ग्रीनहाउस ऑप्शन का इस्तेमाल कर सकती है। इसके जरिए कंपनी एडिशनल या अतिरिक्त शेयर जारी कर सकती है ताकि वो निवेशकों की मांग को पूरा कर सके। हालांकि ओवरसब्सक्रिप्शन के अनुपात के बारे में कंपनी को अपने ऑफर डॉक्यूमेंट में पहले से ही जिक्र करना होगा।

इन तीनों तरीकों से अलॉट हुए शेयर निवेशक, संस्थान या कंरनी के डीमैट अकाउंट में जमा हो जाते हैं।

प्रश्न ऑफ़र डॉक्यूमेंट में क्या जानकारी दी जाती है?

पब्लिक इश्यू ऑफर डॉक्यूमेंट में कई तरह की जानकारियां होती है जैसे कि शेयरों की संख्या, सब्सक्रिप्शन का तरीका आदि। साथ ही इसमें कंपनी से जुड़ी जानकारी होती है जैसे कि प्रोमोटर्स का प्रोफाइल, वित्तीय लेखाजोखा, ट्रैक रिकॉर्ड, कानूनी पहलू आदि। ये डॉक्यूमेंट उस स्टॉक एक्सचेंज में जमा कराया जाता है जिसमें कि कंपनी के शेयरों की लिस्टिंग होगी। इच्छुक निवेशकों को हमारी सलाह है कि वो किसी भी कंपनी में निवेश करने से पहले उसके प्रॉस्पेक्टस (दस्तावेज) को ज़रूर पढ़ें।

प्रश्न इक्विटी में ट्रेड या कारोबार करने के कौन कौन से तरीके हैं?

इक्विटी शेयर्स में कारोबार करने के दो तरीके हैं

नगद बाज़ार में कारोबार नगद बाज़ार में कारोबार के लिए ज़रूरी है कि निवेशक जितने शेयर खरीदना चाहता है उसकी कीमत के बराबर रकम उसके ट्रेडिंग अकाउंट में जमा हो। इसमें डिलिवरी आधारित ट्रांजैक्शन होता है जिसमें खरीदार के अकाउंट में शेयर सर्टिफिकेट की डिलिवरी होती है और खरीदारी में लगी रकम उसके खाते से निकल जाती है। इसे डे ट्रेडिंग के नाम से जाना जाता है। जबकि इंट्रा डे ट्रेडिंग में निवेशक के अकाउंट में शेयर सर्टिफिकेट की असल डिलिवरी नहीं होती है। डे ट्रेडिंग में ट्रेडर उसी दिन अपनी स्थिति रद्द करने के लिए रिवर्स स्थिति में जा सकता है यानी शेयर बेच सकता है। डे ट्रेडिंग के लिए ब्रोकरेज की दर डिलिवरी आधारित ट्रेडिंग के मुकाबले थोड़ी कम होती है। आमतौर पर भारत में शेयर कारोबार के कुल हिस्से का 75-80 फ़ीसदी डे ट्रेडिंग के जरिए ही होता है।

मार्जिन ट्रेडिंग या वायदा बाज़ार में कारोबार - मार्जिन ट्रेडिंग का मतलब ये है कि आप खरीदे गए शेयर्स की आंशिक कीमत का ही भुगतान करते हैं। आमतौर पर मार्जिन ऑर्डर सेटलमेंट अवधि के भीतर ही पूरे करने पड़ते हैं यानी अगर निवेशक चाहे तो वो इस दौरान खरीदे गए शेयर बेच सकता है या बेचे हुए शेयरों को खरीद भी सकता है। चूंकि चूंकि शेयर खरीदते वक्त निवेशक कुछ रकम का ही भुगतान करता है, ऐसे में उसे बड़ा मुनाफा या नुकसान होने की भी संभावना ज़्यादा रहती है। सभी लिस्टेड कंपनियों में मार्जिन ट्रेडिंग की इजाज़त नहीं है।

प्रश्न इक्विटी में ट्रेडिंग के दौरान ऑर्डर देने के कौन कौन से तरीके हैं?

ऑर्डर देने के कई तरीके हैं जो निम्नलिखित हैं

डे ऑर्डर डे ऑर्डर सिर्फ ट्रेडिंग डे के लिए ही वैध होता है। कारोबारी दिन की समाप्ति पर ये ऑर्डर खुद ब खुद कैंसिल हो जाता है।

गुड टिल डेट ऑर्डर इस मामले में निवेशक ऑर्डर की वैलिडिटी के लिए दिनों की संख्या तय कर देता है।

गुड टिल कैंसिल्ड ऑर्डर इस मामले में दिया गया ऑर्डर तब तक वैलिड रहता है जब तक कि निवेशक इसे कैंसिल नहीं कर दे।

लिमिट ऑर्डर लिमिट ऑर्डर देते वक्त निवेशक कारोबार करने के लिए एक प्राइस लिमिट तय कर देता है। खरीदार के लिए ये ऊपरी या सीलिंग लिमिट होती है जबकि बेचनेवाले के लिए निचली या फ्लोर लिमिट होती है।

स्टॉप लॉस ऑर्डर ये ऑर्डर के तहत कोई प्रतिभूति या सिक्योरिटी तभी बेची या खरीदी जाएगी जब ये किसी पूर्व निर्धारित कीमत सीमा को छुएगी। इससे घाटे का खतरा कम होता है। ऑनलाइन ब्रोकरेज ने स्टॉप लॉस प्राइस सेट करना बेहद आसान बना दिया है। यहां जानने वाली बात ये है कि शेयरों की खरीद या बिक्री तभी हो पाएगी जब बेचनेवाला या खरीदार उस तय प्राइस लिमिट पर उपलब्ध होगा।

मार्केट प्राइस ऑर्डर इसके जरिए कोशिश की जाती है कि निवेशक उस वक्त बाज़ार में चल रहे बेहतर रेट पर ऑर्डर दे पाए।

प्रश्न - बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) में लिस्टेड शेयर्स कैसे कैटेगराइज होते हैं?

बीएसई में लिस्टेड ऑर्डिनरी या साधारण शेयरों को निम्नलिखित कैटेगरीज़ में बांटा जा सकता है -

कैटेगरी ए - ये उन कंपनियों के शेयर्स होते हैं जिनकी पूंजी ज्यादा है और शेयरधारकों की संख्या भी। साथ ही इनका ट्रेडिंग टर्नओवर और ग्रोथ रिकॉर्ड भी बेहतर होता है और ये नियमित तौर निवेशकों को डिविडेंड या लाभांश देती हैं। इन शेयरों में मार्जिन ट्रेडिंग और डे ट्रेडिंग, दोनों की इजाज़त है।

कैटेगरी बी 1 - ये उन कंपनियों के शेयर्स हैं जिनकी मार्केट टर्नओवर कैटेगरी ए की कंपनियों जैसी नहीं होती है लेकिन इनकी तरक्की और कमाई संतोषजनक होती है। ऐसी कंपनियों में डे ट्रेडिंग की इजाज़त तो होती है लेकिन मार्जिन ट्रेडिंग नहीं कर सकते हैं।

कैटेगरी बी 2 - ये उन कंपनियों के शेयर हैं जिनका स्तर कैटेगरी ए और बी1 की कंपनियों जैसा नहीं होता है। इन कंपनियों डे ट्रेडिंग की इजाज़त तो होती है लेकिन मार्जिन ट्रेडिंग नहीं कर सकते हैं।

कैटेगरी सी - इस कैटेगरी के शेयर्स में छोटे पैमाने पर फिज़िकल शेयर्स की ही ट्रेडिंग की जा सकती है। इसमें ए, बी1 और बी2 कैटेगरी की कंपनियों के शेयर शामिल हैं। इसीलिए इस मामले में सिर्फ डिलिवरी आधारित कारोबार ही किया जा सकता है। ये कैटेगरी छोटे निवेशकों को खुद शेयरों की खरीद-फरोख्त का मौका देती है, क्योंकि इसके लिए उन्हें डीमैट अकाउंट की ज़रूरत नहीं होती है।

कैटेगरी टी - इस कैटेगरी के तहत उन कंपनियों के शेयर्स आते हैं जिनकी निगरानी सेबी की सर्विलांस कमेटी कर रही होती है। इसमें भी सिर्फ डिलिवरी ट्रेडिंग की इजाज़त होती है।

कैटेगरी ज़ेड - इसके तहत उन कंपनियों के शेयर्स आते हैं जो बीएसई की कुछ शर्तों को पूरा नहीं कर पाते। इसमें भी सिर्फ डिलिवरी ट्रेडिंग की इजाज़त होती है।

कैटेगरी एफ़ और जी - एफ़ कैटेगरी में अपरिवर्तनीय (नॉन कनवर्टिबल) डिबेंचर्स और जी कैटेगरी में केंद्र या राज्य सरकार की प्रतिभूतियां (सिक्योरिटीज़) शामिल की जाती हैं।

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) में शेयरों को सूचीबद्ध या लिस्टेड और परमिटेड जैसी दो कैटेगरीज़ में बांटा जाता है। लिस्टेड शेयर्स वो हैं जो एनएसई में लिस्टेड हैं जबकि परमिटेड शेयर्स वो हैं जो एनएसई के अलावा किसी दूसरे स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड हैं और उन्हें एनएसई में कारोबार करने की मंजूरी मिली होती है।

प्रश्न - स्टॉक डिविडेंड का क्या मतलब है?

सबसे पहले आप ये जान लीजिए कि स्टॉक डिविडेंड का डिविडेंड से कोई लेना देना नहीं है। स्टॉक डिविडेंड एक छोटा बोनस इश्यू है जो बेहद छोटे अनुपात में दिया जाता है, जैसे कि 0.2:1। बोनस इश्यू इससे कई गुना बड़ा होता है।

प्रश्न - स्टॉक स्प्लिट क्या होता है?

स्टॉक स्प्लिट में हर शेयर पहले से कम फ़ेस वैल्यू के शेयरों में टूट जाता है। जैसे कि ऐसा पैसा लिमिटेड के पास 10 रुपये की फेसवैल्यू वाले शेयर्स हैं और कंपनी एक स्टॉक पर दो स्टॉक स्प्लिट करने का फ़ैसला लेती है। यानी हर शेयर दो शेयरों में टूटेगा और हर एक की फेस वैल्यू 5 रुपये होगी। ऐसा ही शेयर्स की मार्केट वैल्यू के साथ भी होगा यानी 100 रुपये मार्केट वैल्यू वाला एक शेयर 50-50 रुपये के दो शेयरों में टूट जाता है।

हालांकि हम स्टॉक स्प्लिट और बोनस इश्यू में काफी हद तक समानता पाते हैं। लेकिन स्टॉक स्प्लिट में शेयर के भाव में कोई बदलाव नहीं आता है और ना ही कंपनी की बैलेंस शीट में रकम की आवाजाही में बदलाव आता है। जबकि बोनस इश्यू में कंपनी के बैलेंस शीट में काफी बदलाव आता है।

स्टॉक स्प्लिट की वजह है किसी कंपनी के एक शेयर के भाव के घटाते हुए उसकी संख्यां में बढ़ोतरी ताकि बाज़ार में कंपनी की लिक्विडिटी बढ़ाई जा सकते। शेयरों के भाव आम निवेशकों की खरीद के दायरे में रहें इसके लिए इंफोसिस जैसे बड़ी कंपनी ने कई बार स्टॉक स्प्लिट की मदद ली है।

प्रश्न - रिवर्स स्प्लिट या कंसॉलिडेशन (एकीकरण) का क्या मतलब है?

यह स्टॉक स्प्लिट का उलटा होता है। यानी की शेयरों की कीमत को बढ़ाने के लिए उनकी को संख्या को कम करना। कंपनियां आमतौर पर रिवर्स स्प्लिट का फ़ैसला तभी लेती हैं जब उनके शेयरों के भाव इतने नीचे चले जाते हैं कि उन पर स्टॉक एक्सचेंड से डीलिस्ट होने का खतरा मंडराने लगता है। ऐसा तभी होता है जब शेयर बाज़ार में लंबे समय तक मंदी का मौसम रहे।

प्रश्न - शेयरों की बाय बैक या पुनर्खरीद का क्या अर्थ है?

बाय बैक या पुनर्खरीद भारत में पहली बार 1998 में देखी गई। तब से लेकर अब तक इसे काफी प्रसिद्धि मिल चुकी है। शेयरों की पुनर्खरीद, शेयर जारी करने के ठीक उलट है। ऐसा तभी होता है जब कंपनी के पास ज़्यादा पैसा हो या उसे लगता हो कि अब निवेश के ज्यादा मौके नहीं है। आमतौर पर पुनर्खरीद में शेयरों की कीमत उनके बाज़ार भाव से ज़्यादा होती है ताकि इसे बेचने वाले शेयर धारकों को फ़ायदा हो सके। पुनर्खरीद से जुड़े तौर-तरीके सेबी द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।

प्रश्न - राइट्स इश्यू क्या है? राइट इश्यू में शेयर पाने के लिए शेयरधारक के पास क्या विकल्प है?

आमतौर पर देखा जाता है कि जब कोई कंपनी इक्विटी मार्केट से पैसा उगाहने के लिए ताज़ा इश्यू लेकर आती है तो उसके पुराने शेयरधारकों को तरजीह दी जाती है। पुराने शेयरधारकों कों उनकी मौजूदा हिस्सेदारी के अनुपात में नए शेयर खरीदने का मौका दिया जाता है ताकि कंपनी में उनकी कुल हिस्सेदारी में कोई बदलाव नहीं आए। खरीदारी के पहले अधिकार को ही राइट्स इश्यू कहा जाता है। ऐसे में जिन शेयरों को मौजूदा शेयरधारक नहीं खरीदते उन्हें आम निवेशकों के लिए खोल दिया जाता है। आमतौर पर राइट्स इश्यू की कीमत मार्केट प्राइस से कम ही रखी जाती है। मौजूदा शेयरधारक के पास ये भी विकल्प होता है कि वो खुद को राइट्स इश्यू से अलग कर ले और शेयरों की खरीद-फरोख्त खुले बाज़ार में करे।

प्रश्न - ब्लॉक ट्रेडिंग क्या है?

ब्लॉक ट्रेडिंग ज़्यादातर बड़े शेयरधारकों या बड़े वित्तीय संस्थानों द्वारा की जाती है। इसमें स्टॉक एक्सचेंज के जरिए भारी तादाद में इक्विटी शेयरों की खरीद फरोख्त की जाती है। ब्लॉक ट्रेडिंग के लिए ऊपरी सीमा (अपर लिमिट) सेबी द्वारा तय की जाती है।

प्रश्न - मार्केट कैपिटलाइजेशन या मार्केट कैप क्या होता है?

किसी कंपनी की मार्केट कैपिटलाइजेशन बाज़ार में उसके एक शेयर की कीमत और शेयरों की कुल संख्या का गुणनफल होता है। उदाहरण के तौर पर ऐसा पैसा लिमिटेड के पास 100,000 शेयर्स हैं और हर शेयर की कीमत है 550 रुपये। ऐसे में कंपनी की मार्केट कैपिटलाइजेशन हुई-

550*100,000 = 55,000,000 रुपये

स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड कंपनियों को श्रेणीबद्ध या कैटेगराइज्ड करने का भी ये सबसे आसान तरीका है। भारत में कंपनियों को निम्नलिखित तरीके से कैटेगराइज़ किया जाता है -

लार्ज कैप कंपनियां - इन कंपनियों का कारोबार अच्छी तरह स्थापित होता है। इन्हें ब्लूचिप कंपनी के नाम से भी जाना जाता है। इनका ट्रैक रिकॉर्ड शानदार होता है और आमतौर पर इनका मार्केट कैपिटलाइजेशन 4000 करोड़ रुपये से ज़्यादा होता है। जैसे इंफोसिस, आईसीआईसीआई, टीसीएस आदि

मिड कैप कंपनियां - ये मझोले आकार की कंपनियां होती हैं जिनकी बाज़ार में अच्छी साख होती है। आमतौर पर इनका मार्केट कैपिटलाइजेशन 250 करोड़ रुपये से लेकर 4000 करोड़ रुपये के बीच होता है। जैसे कि ताज जीवीके और ब्लूस्टार

स्मॉल कैप कंपनियां - आमतौर पर ये कंपनियां बाज़ार में नई लिस्टेड होती हैं या फिर आम लोगों के बीच ज़्यादा मशहूर नहीं होती है। इन कंपनियों का मार्केट कैपिटलाइजेशन आमतौर पर 250 करोड़ रुपये से कम ही होता है।

प्रश्न - पेनी स्टॉक्स क्या हैं?

उन कंपनियों के इक्विटी शेयर्स जिनकी बाज़ार में कीमत उनकी फेस वैल्यू से भी कम होती है, पेनी स्टॉक्स के नाम से जाने जाते हैं। इनमें से ज़्यादातर बुनियादी तौर (फ़ंडामेंटल्स - यानी बेहतरीन मैनेजमेंट, कामकाज का तरीका और अच्छा ट्रैक रिकॉर्ड आदि) पर मजबूत नहीं होती हैं। इनके बारे में निवेशकों को काफी कम जानकारी होती है। इनकी कीमतों में बड़े पैमाने पर उतार-चढ़ाव देखे जाते हैं, यही वजह है कि इनमें निवेश करने वालों के तगड़े मुनाफे और घाटे, दोनों की संभावना रहती है। इन स्टॉक्स से जुड़े रिस्क को देखते हुए छोटे निवेशकों को निवेश के वक्त पूरी एहतियात बरतने की सलाह दी जाती है।

प्रश्न - क्या किसी कंपनी के शेयरों की गिरती मार्केट प्राइस का असर कंपनी के ऑपरेशन (संचालन) पर भी पड़ता है?

हां, हम जानते हैं कि कंपनी का संचालन या ऑपरेशन उसकी शेयर प्राइस पर असर डालता है और इसका उलट भी पूरी तरह सही है। किसी कंपनी के शेयरों की मार्केट प्राइस उसके परफॉर्मेंस या प्रदर्शन का संकेतक है। कंपनी से बाहर का शख्स यानी आम निवेशक जो कंपनी के संचालन के बारे में नहीं जानता है, वो शेयरों की कीमत के आधार पर कंपनी का आंकलन करता है। अगर कंपनी को बाज़ार से ज़्यादा पैसे की ज़रूरत है तो ये आकलन और भी अहम हो जाता है। ऐसे में कंपनी के शेयरों की कम कीमत उसके खराब परफॉर्मेंस के बारे में बताती है, जिसका कि निवेशकों पर भी नकारात्मक असर पड़ता है।

प्रश्न - क्या किसी कंपनी के शेयरों की ट्रेडिंग बीएसई और एनएसई दोनों में की जा सकती है? अगर हां तो क्या दोनों एक्सचेंजों में शेयर की कीमतों में अंतर हो सकता है?

हां, ऐसी कई कंपनियां हैं जिनके शेयरों की ट्रेडिंग बीएसई और एनएसई दोनों में की जा सकती है और उसके शेयरों की कीमत दोनों एक्सचेंजों में अलग अलग हो सकती है। हालांकि कीमतों में अंतर की बड़ी वजह ब्रोकरेज फ़ीस में फर्क, मार्जिन, सेटलमेंट डेट जैसी बातें हो सकती हैं। कीमतों में सामान्य से बड़ा अंतर तभी हो सकता है जब किसी एक एक्सचेंज में उस शेयर की कम कीमत पर खरीदारी हो और दूसरे एक्सचेंज में ज़्यादा कीमत पर बिकवाली हो। हालांकि किसी स्थापित या एस्टैबलिश्ड मार्केट में ऐसा कम ही देखा जाता है।

प्रश्न - मार्क्ड टू मार्केट (एमटीएम) क्या है?

किसी निवेशक के पोर्टफोलियो में शेयरों की खरीदारी के वक्त कीमत की बजाए मौजूदा कीमत को मार्क्ड टू मार्केट यानी एमटीएम कहा जाता है। फ्यूचर्स के मामले में ये मौजूदा समय में किसी स्टॉक की फ्यूचर वैल्यू के बारे में बताता है। किसी कंपनी का मुनाफ़ा और नुकसान मार्क्ड टू मार्केट के आधार पर कैलकुलेट किया जाता है। किसी कारोबारी दिन की समाप्ति पर किसी ट्रेडर का फ़ायदा या नुकसान उसके मार्जिन अकाउंट में जोड़ा या घटाया जाता है। अगर मार्जिन ट्रेडर को हुए घाटे से कम है तो निवेशक को मार्जिन कॉल की जाती है और उम्मीद की जाती है कि वो अपने मार्जिन अकाउंट में ज़रूरी रकम ट्रांसफर करे।

प्रश्न - डेरिवेटिव्स क्या हैं?

डेरिवेटिव्स वो वित्तीय साधन (फ़ाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट) हैं जिनकी कीमत उनसे जुड़े किसी दूसरे या अंतर्निहित संपत्ति (एसेट) से तय होती है। ये अंतर्निहित संपत्ति एक स्टॉक या कमोडिटी भी हो सकता है। फ़ाइनेंशियल डेरिवेटिव्स के फ्यूचर एंड ऑप्शन (एफ एंड ओ) की तरह कैटेगराइज़्ड किया जाता है। इन विस्तृत चर्चा हम दूसरे सेक्शन में करेंगे।

प्रश्न - रेजिस्टेंस और सपोर्ट (प्रतिरोध और समर्थन) से आप क्या समझते हैं?

रेजिस्टेंस और सपोर्ट शेयरों के प्राइस बैंड हैं, जहां मांग और आपूर्ति (डिमांड और सप्लाई) ज़्य़ादा होती है। सपोर्ट वो कीमत है जिस स्तर पर किसी शेयर की डिमांड इतनी होती है वो उस शेयर की कीमत को और गिरने नहीं दे। ज़्यादातर ट्रेडर्स किसी शेयर को उसकी सपोर्ट प्राइस पर खरीदने की इच्छा रखते हैं, जो कि शेयर की कीमतों को और गिरने नहीं देता। बहुत कम ट्रेडर्स इस स्तर पर शेयरों की बिकवाली करते हैं।

रेजिस्टेंस वो कीमत है जहां किसी शेयर की सप्लाई इतनी ज्यादा होती है कि वो उसके शेयर की कीमतों को और उछलने नहीं देती है। ज़्यादातर ट्रेडर्स इस रेजिस्टेंस प्राइस पर शेयरों की बिकवाली करते हैं जिसके चलते शेयर की कीमत आगे नहीं बढ़ पाती है। बहुत कम ट्रेडर्स इस स्तर पर शेयरों को खरीदने की इच्छा रखते हैं। रेज़िस्टेंस लेवल पर शेयर की कीमत हमेशा सपोर्ट लेवल से ज़्यादा होती है।

प्रश्न - सर्किट ब्रोकर क्या है और ये क्यों महत्वपूर्ण है?

सर्किट ब्रेकर वो जरिया है जिसकी मदद से स्टॉक एक्सचेंज किसी शेयर की बेहद अस्थिर (हाईली वोलैटाइल) प्राइस मूवमेंट पर काबू पाने के लिए उस शेयर में कारोबार को फ्रीज कर देता है यानी रोक देता है। मार्केट में सर्किट ब्रेकर सेबी लगाता है।

मौजूदा समय में प्राइस मूवमेंट की तीन कैटेगरीज़ हैं, जिनके दौरान सर्किट ब्रेकर लागू किया जा सकता है- किसी शेयर के लिए किसी एक दिन में 2, 5 और 10 फ़ीसदी के बदलाव पर सर्किट ब्रेकर लगाया जा सकता है। इनको प्राइस बैंड भी कहा जाता है।

अगर पूरे मार्केट की बात करें तो ये आंकड़ा 10, 15 और 20 फ़ीसदी हो जाता है। यानी अगर मार्केट में इन स्तरों पर गिरावट देखी जाती है तो ट्रेडिंग बंद कर दी जाती है। यहां तक कि अगर कोई एक इंडेक्स सर्किट बैरियर तक पहुंचता है तो भी शेयरों में कारोबार एक तय समय सीमा के लिए रोक दिया जाता है।

अगर कोई स्टॉक डेरिवेटिव सेगमेंट में मौजूद है तो उस पर कोई सर्किट ब्रेकर नहीं लगेगा।

प्रश्न एडवांस डिक्लाइन रेशियो का क्या अर्थ है?

एडवांस डिक्लाइन रेशियो वो किसी एक कारोबारी दिन में उछलने वाले और गिरने वाले शेयरों का अनुपात है। इससे पता चलता है कि मार्केट में कितने शेयरों की कीमत बढ़ी है और कितने की गिरी है। बड़े पैमाने पर ये मार्केट की स्थिति का बेहतरीन संकेतक (इंडिकेटर) है।

प्रश्न - पी/ई रेशियो का क्या अभिप्राय है?

पीई रेशिय कंपनी के प्रति शेयर कीमत और प्रति शेयर होने वाली आय का अनुपात है (शेयरों से होने वाली कुल कमाई को कुल शेयर संख्या से भाग देने पर मिलता है)। किसी स्टॉक के परफ़ॉर्मेंस को आंकने का ये सबसे आसान पैमाना है। अगर दो कंपनियों की प्रति शेयर आय बराबर है लेकिन एक का पीई रेशियो ज्यादा है तो जिस कंपनी का पीई रेशियो ज्यादा है उसका भविष्य बेहतर माना जा सकता है। मार्केट के नजरिए से उस स्टॉक में बेहतर करने की क्षमता है। फंडामेंटल एनालिसिस (बुनियादी विश्लेषण) के जरिए स्टॉक पर रिसर्च करने वाले एक्सपर्ट इस रेशियो को बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं।

प्रश्न - फंडामेंटल एनालिसिस से क्या समझते हैं?

फंडामेंटल एनालिसिस या बुनियादी विश्लेषण वे तरीका है जिसके जरिए किसी शेयर के भविष्य का आकलन किया जाता है। ये एक विस्तृत क्षेत्र है जिसके बारे में हम यहां थोड़ी सी ही चर्चा करेंगे। फंडामेंटल एनालिसिस का उद्देश्य किसी सिक्योरिटी या स्टॉक की बुनियादी बातों यानी की फंडामेंटल वैल्यूज़ की तह तक पहुंचना है। ये वैल्यू कंपनी की कई आंतरिक पहलुओं और उसके वातावरण पर निर्भर करती है। इस एनालिसिस में कंपनी से जुड़ी जानकारियों का आकलन और उनके असर को समझा जाता है। एनालिसिस के आखिर में अगर कंपनी की फंडामेंटल वैल्यू बेहतर पाई जाती है तो माना जाता है कि उसके शेयर की मौजीदा कीमत और बढ़ेगी और अगर फंडामेंटल वैल्यू खराब होती है तो शेयर की मौजूदा कीमतों में गिरावट का अनुमान लगाया जाता है। कहा जा सकता है कि किसी कंपनी के बारे में जानने के लिए फंडामेंटल वैल्यू काफी हद कर निषप्क्ष होती है। एनालिसिस का दूसरा तरीका है टेक्निकल एनालिसिस।

प्रश्न टेक्निकल एनालिसिस का क्या मतलब है?

टेक्निकल एनालिसिस यानी तकनीकी विश्लेषण में मार्केट का अध्ययन किया जाता है ना कि शेयरों की। ये आंकड़ों का एक अपनी ही तरह का विज्ञान है, जिसमें ग्राफिक्स, स्टॉक्स ट्रेडिंग का इतिहास की जानकारी के आधार पर भविष्य के मार्केट की गणना की जाती है। टेक्निकल एनालिस्ट का मानना है कि स्टॉक्स से जुड़ी हर जानकारी उसकी कीमत पर असर डालती है, ऐसे में शेयर की कीमत ही सबसे अहम पैमाना है। वो मानते हैं कि किसी स्टॉक में कीमत का ट्रेंड या चलन काफी समय तक बना रहता है और इसी का पता लगाना उनका मुख्य उद्देश्य है। टेक्निकल एनालिसिस का सिद्धांत निकला है चार्ल्स डाउ की किताब डाउ थ्योरी से (चार्ल्स डाउ फाइनेंशियल न्यूज़ सर्विस डाउ जोंस के संस्थापक हैं।) ये सिद्धांत शेयर बाज़ार से जुड़े कई ऐसे ट्रेंड्स के बारे में बताता है जिसे एक निवेशक को समझना और बूझना चाहिए।

1. प्राइमरी ट्रेंड्स - ये बड़े पैमाने पर बाज़ार में होने वाली उठा-पटक का ट्रेंड है जो कि एक साल से ज्यादा समय तक चलता है और कभी कभी तो कई साल तक चलता रहता है। हर बढ़ती कीमत उस स्टॉक के पुराने स्तर से ऊपर पहुंचती है और नीचे से ऊपर जाते वक्त प्राइस दो पुराने स्तर के ऊपर जाकर रुक जाती है… यानी प्राइमरी ट्रेंड ऊपर की ओर जा रहे हैं। इसका मतलब ये हुआ कि बुल मार्केट है यानी तेज़ी का माहौल है… और अगर इसका उलटा हो तो हम कह सकते हैं बीयर मार्केट है यानी मार्केट में मंदी चल रही है। प्राइमरी ट्रेंड ही वो ट्रेंड है जिससे लॉन्ग टर्म इनवेस्टर (लंबी अवधि के निवेशक) जुड़ा होता है और इसी के आधार पर वो बुल मार्केट में शेयर खरीदता है और उसे होल्ड करता है।

2. सेकेंडरी ट्रेंड - ये बीच-बीच में आने वाली गिरावट या दूसरे शब्दों में कहें तो करेक्शन (संशोधन) हैं जो कि बुल मार्केट में आते रहते हैं या फिर बिकवाली में तेज़ी या रिकवरी जो कि बीयर मार्केट में आती है। सेकेंडरी ट्रेंड्स आमतौर पर तीन हफ्तों से तीन महीने तक रहते हैं।

3. माइनर ट्रेंड्स - ये छोटे मोटे उतार-चढ़ाव होते हैं जिनका अपने आप में कोई मतलब नहीं होता, लेकिन जब ऐसे कई ट्रेंड्स आपस में जुड़ जाते हैं तो मार्केट में सेकेंडरी ट्रेंड्स नज़र आने लगता है। आमतौर पर माइनर ट्रेंड्स 6 दिन से लेकर 3 हफ्तों तक रहते हैं। माइनर ट्रेंड्स के साथ छेड़छाड़ मुमकिन है और इसीलिए इन्हें नज़रअंदाज़ किया जाता है। टेक्निकल एनालिसिस के एक सिद्धांत के मुताबिक वाल्यूम ट्रेंड के साथ चलता है। यानी की अगर शेयर की कीमत प्राइमरी ट्रेंड के मुताबिक बढ़ रही है तो बाज़ार में ट्रेडिंग एक्टिविटी या वॉल्यूम बढ़ती है… यही वजह है कि बुल मार्केट में बाज़ार का वॉल्यूम बढ़ता है। जब कीमतें बढ़ती हैं या गिरती हैं तो बीयर मार्केट दिखता है जिसमें कीमत गिरने पर वॉल्यूम बढ़ता है और कीमत बढ़ने पर वॉल्यूम घटता है। इस सिद्धांत के उलट बाज़ार में कोई बड़ा बदलाव दिखता है तो उस पर गंभीरता से विचार ज़रूरी है।

प्रश्न क्या गिरते बाज़ार में मुनाफ़ा कमाया जा सकता है?

हां, इसके लिए आप या तो शॉर्ट सेलिंग कर सकते हैं या इक्विटी फ्यूचर्स में कारोबार कर सकते हैं।

प्रश्न क्या मैं ब्रोकर की गलतियों के खिलाफ़ शिकायत दर्ज़ करा सकता हूं?

हां, अगर आप अपने ब्रोकर की सेवाओं से संतुष्ट नहीं हैं तो उसके खिलाफ़ शिकायत दर्ज़ करा सकते हैं। आप चाहें तो सीधे संबंधित एक्सचेंज को लिख सकते हैं। बीएसई में एक इनवेस्टर सर्विसेज़ सेल है और एनएसई में इनवेस्टर ग्रीवांसेज़ सेल (निवेशक शिकायत निस्तारण सेल) है, जो ब्रोकरों की मनमानी पर रोक लगाकर निवेशकों की मदद कर सकते हैं।